भाजपा ने जो राह दिखाई थी उस पर चली कांग्रेस?
नई दिल्ली । संसद के मानसून सत्र-2026 के बेहद कम कामकाज ने एक बार फिर सदन में लगातार बढ़ते व्यवधान पर सवाल खड़े किये हैं। 13 अगस्त को समाप्त हुए सत्र में लोकसभा की उत्पादकता अलग-अलग आकलनों में करीब 19 प्रतिशत रही, जबकि राज्यसभा 39 प्रतिशत पर रही। आंकड़ों के अनुसार 2004 के बाद केवल दो सत्र इससे भी कम उत्पादक रहे हैं।
उपलब्ध संसदीय आंकड़ों के अनुसार 2004-2026 के बीच सबसे खराब दौर 2010 का शीतकालीन सत्र प्रमुख है। लोकसभा में महज 5 प्रतिशत और राज्यसभा में 12 प्रतिशत काम हुआ था। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर जेपीसी की मांग को लेकर विपक्ष के हंगामे से पूरा सत्र लगभग ठप रहा। 2013 के शीतकालीन सत्र में भी लोकसभा में करीब 8 और राज्यसभा में 19 प्रतिशत काम हुआ। 2014 के बजट सत्र में लोकसभा की उत्पादकता करीब 21 और राज्यसभा मे 27 प्रतिशत कामकाज हुआ था।
इसके विपरीत कई सत्रों में संसद ने निर्धारित समय से भी अधिक काम किया। 2024 के बजट सत्र में लोकसभा की उत्पादकता 148 प्रतिशत, 2020 के मानसून सत्र में 145 प्रतिशत, 2023 के विशेष सत्र में 137 प्रतिशत रही। एक ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद कभी रिकॉर्ड काम करती है, कभी नारेबाजी और व्यवधान का मंच बन जाती है।
विडंबना यह है कि आज जिस रणनीति के लिए कांग्रेस और विपक्ष की आलोचना हो रही है. भाजपा विपक्ष में रहते हुए संसद के कामकाज में इसी तरह का प्रदर्शन कर चुकी है।
तत्कालीन भाजपा की नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने 2012 में कहा था, संसद को रोकना भी लोकतंत्र एवं संसदीय परम्परा का एक रूप है. सरकार को सदन चलाना चाहिए। सदन चलाने की जिम्मेदारी सरकार की है. अरुण जेटली ने भी कहा था, कुछ परिस्थितियों में संसद में व्यवधान देश के लिए अधिक लाभकारी होता है।
आज राजनीतिक भूमिका बदल गई है, तर्क वही हैं। फर्क सिर्फ इतना है, पहिले भाजपा व्यवधान कर रही थी, तब भाजपा विपक्ष में थी. आज कांग्रेस विपक्ष मे है, वह कर रहे हैं। सवाल किसी एक दल का नहीं, बल्कि यह है, जनता के करोड़ों रुपये खर्च कर चलने वाली संसद में बहस, जवाबदेही और कानून निर्माण को हंगामे की राजनीति से कब मुक्त होगी।
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