अगर आपका बच्चा लॉकडाउन के दौरान पैदा हुआ है, तो यह रिपोर्ट आपके लिए बेहद जरूरी
कोरोना महामारी के दौर के बाद अब स्वास्थ्य विशेषज्ञ बच्चों के विकास को लेकर एक नई चिंता साझा कर रहे हैं। हालिया शोधों से संकेत मिले हैं कि लॉकडाउन और महामारी के दौरान जन्मे बच्चों के दिमागी और व्यवहारिक विकास पर असर पड़ सकता है।
लॉकडाउन में जन्मे बच्चों के विकास पर अध्ययन
लंदन के सिटी सेंट जॉर्ज यूनिवर्सिटी द्वारा किए गए एक महत्वपूर्ण अध्ययन में 2020 में जन्मे 205 बच्चों पर शोध किया गया। इस अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:
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एक्जीक्यूटिव फंक्शनिंग में कमी: शोध में पाया गया कि इन बच्चों में 'एक्जीक्यूटिव फंक्शन' का स्तर अपेक्षा से कम था। इसका अर्थ है कि उन्हें योजना बनाने, समस्याओं को हल करने, भावनाओं को नियंत्रित करने और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई हो सकती है।
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सीखने की क्षमता पर असर: अध्ययन में शामिल हर तीन में से एक बच्चे में व्यवहार और सीखने से संबंधित चुनौतियां देखी गई हैं। उनकी सोचने-समझने की क्षमता (नॉन-वर्बल रीजनिंग) भी सामान्य मानकों से थोड़ी कमजोर पाई गई है।
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सामाजिक अनुभव का अभाव: विशेषज्ञों का मानना है कि लॉकडाउन के कारण बच्चों को घर के बाहर के सामाजिक अनुभवों, अलग-अलग लोगों से मिलने और बातचीत करने के अवसर कम मिले, जिससे उनकी बोलने और भावनाओं को व्यक्त करने की क्षमता पर असर पड़ा है।
माता-पिता और स्कूलों के लिए सतर्कता जरूरी
विशेषज्ञों के अनुसार, शुरुआती वर्ष बच्चों के सीखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। लॉकडाउन के दौरान बच्चों का दायरा केवल घर की चार दीवारों तक सीमित था, जिससे उन्हें वह विविधतापूर्ण माहौल नहीं मिला जो सामान्यतः बचपन में मिलता है।
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अतिरिक्त सहयोग की आवश्यकता: शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि परिवारों और स्कूलों को ऐसे बच्चों की पहचान कर उन्हें विशेष सहयोग और संसाधनों की आवश्यकता पड़ सकती है, ताकि उनकी सीखने की जरूरतों को पूरा किया जा सके।
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सकारात्मक पहलू: राहत की बात यह है कि बच्चों की शारीरिक गतिविधियाँ (मोटर स्किल्स) अपनी उम्र के हिसाब से सामान्य पाई गई हैं। इसके अलावा, लॉकडाउन में माता-पिता के साथ बिताए गए अधिक समय के कारण बच्चों की भाषा समझने की क्षमता पर कोई नकारात्मक असर नहीं देखा गया।
निष्कर्ष और आगे की राह
यह एक शुरुआती अवलोकन अध्ययन है, जिसका अर्थ यह नहीं है कि बच्चों में दिख रही चुनौतियों का एकमात्र कारण सिर्फ लॉकडाउन ही है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन बच्चों पर आगे भी नजर रखने की जरूरत है ताकि उनके विकास के वास्तविक पहलुओं को बेहतर ढंग से समझा जा सके। माता-पिता को सलाह दी गई है कि वे बच्चों के साथ संवाद बढ़ाएं और उन्हें विभिन्न प्रकार के सामाजिक एवं खेल गतिविधियों में शामिल करें ताकि उनकी क्षमताएं बेहतर हो सकें।
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