सवाई माधोपुर। राजस्थान के सबसे पहले और दुनिया भर में मशहूर टाइगर रिजर्व ‘रणथंभौर’ से वन्यजीव संरक्षण को लेकर एक बेहद सुखद और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। कभी केवल 25 बाघों की आबादी के साथ अपनी पहचान बचाने के लिए जूझ रहे इस नेशनल पार्क में अब बाघों का कुनबा बढ़कर रिकॉर्ड 77 तक पहुंच गया है। पिछले 53 वर्षों में रणथंभौर के जंगलों में केवल बाघों की आबादी में ही भारी इजाफा नहीं हुआ है, बल्कि उनकी निगरानी और गणना के पारंपरिक तरीकों में भी एक युगांतकारी बदलाव आया है।

पंजों के निशान से डिजिटल कैमरों तक का सफर

जंगल के भीतर वन्यजीवों की निगरानी का तरीका अब पूरी तरह से बदल चुका है। एक दौर वह था जब वनकर्मी भीषण गर्मी और कठिन रास्तों पर चलकर बाघों के पंजों के निशान यानी 'पगमार्क' खोजा करते थे, और उन्हीं के आधार पर अनुमानित गणना की जाती थी। लेकिन आज आधुनिक तकनीक के इस युग में पगमार्क खोजने के थकाऊ काम की जगह हाई-टेक ट्रैप कैमरों ने ले ली है। अब जंगलों के चप्पे-चप्पे पर मोशन-सेंसिटिव कैमरे लगाए जाते हैं, जो वन्यजीवों की हर हरकत पर पैनी नजर रखते हैं।

आधुनिक वायरलेस तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस

वर्तमान में रणथंभौर टाइगर रिजर्व में बाघों की सुरक्षा और उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। आधुनिक कैमरों से खींची गई तस्वीरों और जीपीएस तकनीक के जरिए न केवल बाघों की सटीक संख्या का पता चलता है, बल्कि उनके स्वास्थ्य, आपसी टेरिटरी और शावकों की स्थिति पर भी रियल-टाइम निगरानी रखी जाती है। इस डिजिटल बदलाव के कारण गणना में मानवीय चूक की गुंजाइश पूरी तरह खत्म हो गई है और वन्यजीवों को बिना किसी खलल के सुरक्षित माहौल मिल रहा है।

बढ़ती आबादी के साथ प्रबंधन की नई चुनौतियां

बाघों के इस ऐतिहासिक कुनबे ने रणथंभौर को देश के सबसे सघन बाघ आबादी वाले क्षेत्रों में लाकर खड़ा कर दिया है। हालांकि, बाघों की संख्या 77 तक पहुंचने के कारण अब वन विभाग के सामने उनके रहने के दायरे यानी टेरिटरी को लेकर नई चुनौतियां भी खड़ी हो रही हैं। युवा होते बाघ और बाघिन अपने लिए नए इलाकों की तलाश में निकल रहे हैं, जिसे देखते हुए प्रशासन अब वन्यजीव गलियारों (कॉरिडोर) को और मजबूत बनाने के साथ-साथ उनके सुरक्षित विस्थापन की योजनाओं पर भी गंभीरता से काम कर रहा है।