बरेली, जिसे नाथ नगरी के नाम से जाना जाता है, सात अति प्राचीन और सिद्ध शिव मंदिरों के सुरक्षा घेरे में बसा है. त्रिवटी नाथ से लेकर अलखनाथ और धोपेश्वर नाथ तक, हर मंदिर का अपना एक गौरवशाली इतिहास है जो महाभारत काल और ऋषि-मुनियों की कठोर तपस्या से जुड़ा है. कहीं भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए, तो कहीं द्रौपदी ने शिवलिंग की स्थापना की. इन मंदिरों की अटूट शक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुगल काल में औरंगजेब की सेना भी इन सिद्ध पीठों का बाल भी बांका नहीं कर सकी थी. आइए जानते हैं नाथ नगरी के इन सप्त नाथ मंदिरों की पौराणिक कथाएं और उनका आध्यात्मिक महत्व, जो बरेली को एक पवित्र केंद्र बनाते हैं.
 बरेली में त्रिवटी नाथ मंदिर एक अत्यंत प्राचीन और सिद्ध स्थल है. इसका इतिहास लगभग 600 वर्ष पुराना माना जाता है. इसका 'त्रिवटी' नाम यहां मौजूद तीन प्राचीन वट वृक्षों के कारण पड़ा है. पौराणिक कथा के अनुसार, वर्ष 1417 में एक चरवाहे मोहन चंद्र गड़ेरिया को भगवान शिव ने सपने में दर्शन देकर बताया था कि इन तीन वट वृक्षों के नीचे उनका शिवलिंग दबा हुआ है. सुबह जागने पर जब खुदाई की गई, तो वहां वास्तव में शिवलिंग मिला. आज यहां राजस्थानी लाल पत्थरों से नागर शैली में भव्य मंदिर बना है, जहां भगवान शिव की 60 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित है.

 बरेली में स्थित अलखनाथ मंदिर शहर के सात प्रमुख शिव मंदिरों में से एक है. मान्यताओं के अनुसार इसका इतिहास लगभग 1,000 वर्ष पुराना है, हालांकि शिलालेखों में इसकी प्राचीनता महाभारत काल से भी पहले की बताई जाती है. इस स्थान का नाम आनंद अखाड़े के प्रसिद्ध नागा साधु बाबा अलखिया अलख गिरि के नाम पर पड़ा, जिन्होंने यहां एक प्राचीन वट वृक्ष के नीचे कठिन तपस्या की थी. कहा जाता है कि 17वीं शताब्दी में मुगलों ने इस मंदिर को क्षति पहुंचाने की कोशिश की थी, लेकिन बाबा अलखिया के आध्यात्मिक प्रताप के कारण वे इस क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सके.

 सुभाष नगर में स्थित तपेश्वर नाथ मंदिर का इतिहास साधु-संतों की कठोर तपस्या से जुड़ा है. महंत बाबा लखन दास के अनुसार, यह स्थान लगभग 5,000 वर्ष पुराना है. यहां की सबसे प्रमुख मान्यता "भालू बाबा" की है. कहा जाता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व यहां के घने जंगल में एक बाबा ने गुफा में रहकर 400 वर्षों तक तपस्या की थी. लंबी तपस्या के कारण उनके शरीर पर भालू जैसे बाल उग आए थे, इसलिए उन्हें 'भालू दास बाबा' कहा जाने लगा. भगवान शिव ने संतों की तपस्या से प्रसन्न होकर इस स्थान को "तपेश्वरनाथ" नाम दिया था.

 बरेली का धोपेश्वर नाथ मंदिर शहर के सबसे प्राचीन शिव मंदिरों में से एक है, जिसका संबंध द्वापर युग और महाभारत काल से माना जाता है. मान्यता है कि त्रेतायुग में महर्षि अत्रि के शिष्य और पांडवों के गुरु धूम्र ऋषि ने इस स्थान पर कठिन तपस्या की थी. ऋषि के नाम पर ही इस शिवलिंग का नाम पहले 'धूमेश्वर नाथ' पड़ा, जो समय के साथ बदलकर धोपेश्वर नाथ हो गया. एक पौराणिक मान्यता यह भी है कि इसी पवित्र स्थल पर भगवान शिव की कृपा से द्रौपदी और धृष्टद्युम्न अग्निकुंड से प्रकट हुए थे.

 बरेली के बिहार कॉलोनी क्षेत्र में स्थित पशुपतिनाथ मंदिर (जगमोहनेश्वर मंदिर) का इतिहास काफी आधुनिक और प्रेरणादायक है. यह मंदिर नेपाल के काठमांडू स्थित सुप्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर की तर्ज पर बनाया गया है. इसके निर्माण का संकल्प 1988 में एक श्रद्धालु व्यापारी श्री जगमोहन सिंह ने लिया था. कई वर्षों के संघर्ष के बाद, वर्ष 2001 में इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ. मंदिर के मुख्य शिवलिंग की स्थापना 3 मार्च 2002 को जगतगुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के सानिध्य में की गई थी. यह पीलीभीत बाईपास के पास स्थित है.

 जोगी नवादा में स्थित वनखंडी नाथ मंदिर का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने यहाँ शिवलिंग की स्थापना की थी और तपस्या की थी. अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने यहां समय बिताया था. प्राचीन समय में घने जंगलों (वन खंड) से घिरा होने के कारण इसे "वनखंडी" कहा जाने लगा. मुगल काल में औरंगजेब ने इस मंदिर को नष्ट करने का प्रयास किया था, लेकिन वह शिवलिंग की एक ईंट तक नहीं हिला सका. यहां आज भी कई प्राचीन ऋषियों की समाधियां मौजूद हैं.

 वहीं, श्री तपेश्वर नाथ मंदिर के बारे में मान्यता है कि प्राचीन काल में यहां बांस का बहुत घना जंगल हुआ करता था और मंदिर के पास से ही गंगा नदी बहती थी. इसी कारण यहां की मिट्टी आज भी रेतीली पाई जाती है. यहां का शिवलिंग एक पीपल के पेड़ के नीचे स्वयंभू (अपने आप) प्रकट हुआ माना जाता है. भालू बाबा के अलावा यहां ध्रुम ऋषि के शिष्यों, बाबा राम टहल दास और बाबा मुनीश्वर दास जैसे कई महान संतों ने तपस्या कर इस भूमि को पवित्र बनाया है.

 इतना ही नहीं यहां के शिवलिंग के बारे में यह प्रसिद्ध है कि यह दिन में तीन बार अपना रंग बदलता है. स्थानीय लोगों का अटूट विश्वास है कि यह सिद्ध पीठ बरेली शहर को प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रखता है. पांचाल नरेश द्रुपद की पुत्री द्रौपदी ने भी यहां भगवान शिव की विधिवत पूजा-अर्चना की थी. कहा जाता है कि विदेशी हमलावरों और मुगल शासकों ने कई बार इन मंदिरों को निशाना बनाने की कोशिश की, लेकिन ईश्वरीय शक्ति के आगे वे हमेशा विफल रहे और मंदिर की एक ईंट भी नहीं हटा सके.