जबलपुर के शैल्बी हॉस्पिटल में भर्ती मरीज को पत्रकार की मदद से मिला इंसाफ, इंश्योरेंस के बाद भी थमा दिया ₹3.72 लाख का बिल! 

जसवंत सिंह राजपूत 
( प्रदेश की न्यूज़-जबलपुर )

जबलपुर, 15 जून 2025 – जब मरीज डॉक्टर पर भरोसा करता है, तो उम्मीद होती है कि इलाज के साथ इंसानियत भी मिलेगी। लेकिन जबलपुर के नामचीन शैल्बी हॉस्पिटल में कुछ ऐसा हुआ, जिसने इस भरोसे को हिला दिया। मंडला जिले की निवास तहसील से आए नरेंद्र रैदास, घुटने के ऑपरेशन के लिए शैल्बी हॉस्पिटल में भर्ती हुए थे। नरेंद्र के पास वैध हेल्थ इंश्योरेंस था और उन्हें अस्पताल प्रबंधन की ओर से पहले ही भरोसा दिलाया गया था कि उनका सारा खर्च इंश्योरेंस से कवर हो जाएगा। उन्हें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि "आपको कोई पैसा नहीं देना पड़ेगा।" लेकिन जब उन्हें डिस्चार्ज करने का वक्त आया, तो शैल्बी हॉस्पिटल ने उन्हें एक चौंकाने वाला ₹3,72,000 ( तीन लाख बहत्तर हज़ार रुपए ) का बिल थमा दिया। इस अनअपेक्षित और भारी-भरकम बिल को देखकर नरेंद्र और उनके परिजन सदमे में आ गए।

आशंका और अफरा-तफरी के माहौल में नरेंद्र ने मदद के लिए इधर-उधर संपर्क करना शुरू किया। आखिरकार उनकी बात जिले के जाने-माने पत्रकार जसवंत सिंह राजपूत तक पहुँची। पीड़ित नरेंद्र रैदास ने दिनांक 15/06/2025 शाम 5 बजे, पत्रकार जसवंत सिंह राजपूत जी को फोन कर अपनी व्यथा सुनाई। पत्रकार श्री राजपूत जी ने भी मामले को गंभीरता से लिया, बल्कि तत्काल अस्पताल प्रबंधन से संवाद कर मरीज की स्थिति स्पष्ट कराई।
पत्रकार की सक्रियता के बाद ही अस्पताल की ओर से पुनः दस्तावेजों की जांच की गई, और यह सामने आया कि इंश्योरेंस की प्रक्रिया में लापरवाही हुई है – जो कि पूरी तरह अस्पताल प्रबंधन की जिम्मेदारी थी। 

शैल्बी हॉस्पिटल द्वारा मरीज से नहीं लिया गया कोई भी शुल्क
इस पूरे मामले में जब पीड़ित मरीज नरेंद्र रैदास ने पत्रकार जसवंत सिंह राजपूत को एक घंटे बाद फोन किया और बताया कि हमें डिस्चार्ज कर दिया गया है और हमसे किसी भी प्रकार का कोई भी शुल्क नहीं लिया गया है।

बड़ा सवाल:
शैल्बी हॉस्पिटल जैसे बड़े अस्पतालों में जब इस तरह की लापरवाही होती है, तो आम मरीज कहां जाए? क्या इंश्योरेंस के नाम पर ऐसे ही आम जनता को ठगा जाएगा? और अगर पत्रकार न होते, तो क्या नरेंद्र जैसे गरीब मरीज को बिना बिल चुकाए छुट्टी मिलती ?

इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या अस्पताल अब सेवा का स्थान रह गए हैं या व्यावसायिक लूट का अड्डा बनते जा रहे हैं।